परत-दर-परत
तहजीबों के चिथड़े
उतार फेंके।
हवा आती है अब!
अब बेफ़िक्र जीता हूँ।
२.
वह अर्श
आशियाना बना फिरता था।
नंगों ने
हाथ बढाकर चिथड़े कर डाले उसके।
सच है-
भूख अपना-पराया नहीं जानती।
३.
तुम्हारे दर से कई बार
अनकहे लौटा हूँ।
कहते हैं-
खुदा भी नैनों के बोल समझता है।
४.
अमूमन हर शाम
कोसता हूँ खुद को,
अमूमन हर रात
मैं मर जाता हूँ।
बाबूजी को दमा था
और मैं कपूत...
अब मैं भी बाप हूँ।
५.
तुम्हारे टेरेस का
वह नन्हा पीपल
जो
ढँकता था चाँद को ...तुमसे।
सुना है जल गया है।
कहा था ना!
शहर का माहौल ठीक नहीं।
६.
१३ अंश २० कला-
स्वाति नक्षत्र
और एक चातक!
उसने कहा था-
प्यार ऎसा हीं होता है।
कल सरहद पर शहीद हो गया वह।
लोग कहते हैं कि
दसियों साल से कैंसर था उसे।
देशप्रेम!
प्यार इसी को कहते हैं ना?
रविवार, 16 मार्च 2008
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